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कांकेर जिले के रसोली गांव में न पानी और न  है सड़क, दूषित पानी पीने को मजबूर है ग्रामीण

कांकेर जिले के रसोली गांव में न पानी और न है सड़क, दूषित पानी पीने को मजबूर है ग्रामीण

 

संतोष बाजपेयी ब्यूरो प्रमुख कांकेर- कांकेर जिला के दुर्गूकोदल क्षेत्र में आज भी यहां जीने के लिए मजबूरी में पीते हैं झरिया का गंदा पानी, सालों से है सिर्फ झरिया के सहारे दुर्गकोंदल विकासखंड के अंतिम छोर में बसे रसोली गांव के ग्रामवासी मूलभूत सुविधाओं के लिए पिछले कई सालों से जूझ रहे हैं, और इनकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं है। यहां ना सड़क है और ना ही पानी। भीषण गर्मी से जहां लोग परेशान हैं। वहीं ग्रामीण अपनी प्यास बुझाने के लिए झरिया का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। गांव के ग्रामीण पिछले कई सालों से इसी गंदे पानी से अपनी प्यास बुझा रहे हैं। यहां शासन प्रशासन द्वारा एक हैंडपंप भी खनन कराया गया है, लेकिन वह भी पिछले 3 सालों से बंद पड़ा हुआ है। कई बार गुहार लगाने के बावजूद भी उनकी एक भी सुनवाई नहीं हुई.लिहाजा ग्रामीण इस गंदे पानी को पीकर मजबूरी में अपनी जान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

तराई घोटिया के आश्रित ग्राम रसोली में 17 परिवार निवास करते हैं। ग्रामीण हरि कवाची, विशेष गावड़े, चमार सिंह कवाची, कमेश्वर कवाची, धनरो बाई गावड़े, सुदारो बाई कवाची, चयतो बाई गावड़े, मेनका कवाची, अमिला कवाची,  संत्री गावड़े, ईश्वरी गावड़े, सुकेश नरेटी, कमला कवाची, सूबे सिंह गावड़े,  सोबराय गावड़े ने बताया कि करीब 3 साल पहले गांव में 1 हैंडपंप लगाया गया था जो कुछ ही दिन चला और उसके बाद पूरी तरह से खराब हो चुका हैं। पानी लेने गांव से दूर पहाड़ियों से निकलने वाले झरिया के पास जाते हैं। ग्रामीणों ने कहा कि इस झरिया से गंदा पानी आता है लेकिन जीने के लिए पानी पीना भी मजबूरी है। ग्रामीणों ने बताया कि इसी पानी से मवेशी और जंगली जानवर भी प्यास बुझाते हैं, साथ ही ग्रामीण इसी पानी से निस्तारण भी करते हैं।

सड़क और पुलिया भी नहीं

इसके साथ ही गांव में कोई पक्का रोड नहीं है जिसकी वजह से उन्हें कच्ची पथरीली रास्तों से आना जाना करना पड़ता है। इस गांव में पहुँचने के लिए 2 नाले भी पड़ता है। जिसमे पुलिया नही होने से ग्रामीण बारिश के दिनों में ब्लाक हो जाते हैं। इस दौरान अगर कोई बीमार पड़ता है, तो उसे अस्पताल ले जाने के लिए बड़ी मुश्किल हो जाता है।

इस तरह इस क्षेत्र के ग्रामवासी मूलभूत सुविधाओं के लिए पिछले कई सालों से जूझ रहे हैं और इनकी सुध लेने वाला भी कोई नहीं है।

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